अमीरों के लिये समाजवाद

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अमीरों के लिये समाजवाद

इस बात को एक साल से ज्यादा हो चुका है कि आपातकालीन स्थिति-विरोधी बोटों की लहर पर तैरता हुआ जनता पक्ष सता की गद्दी पर आ बैठा. अपने लोक-सभा चुनाव घोषाणा पत्र में, और सरकार बनाने के बाद भी, जनता पक्ष ने बडे उद्योग-गृहाँ के विस्तार के खिलाफ कदम उठाने का बबन दिया था. उसने यह भी बक्न दिया था कि भारतीय जनता की परिस्थितियों में सुधार लाये जाएंगे, बेशक, पाठक को याद होगा कि यह बक्न बिलकुल नये नही है. बल्कि, चुनाव के लिये खड़ा रहने बाठा प्रत्येके पक्ष ऐसे बक्न दिया करता है. वास्तव में, १९६९ में काग्रेस के दो टुक्डे हो जाने के बाद, इन्दिरा गांधी ने देश की जनता को यही वबन दिया था. उसके बाद के चुनाव में, इन्दिरा गांधी के नेतृत्व के नीचे काग्रेस पार्टी ने, गरीबी हटाओ का नारा लगाते हुए, एक प्रबंड विजय प्राप्त की थी.

इस तरह, भारत में बबन बडी आसानी से मिल जाते है, परन्तु उनको निभाया कहां तक जाता है? इस रिपोर्ट में, पहले हम काग्रेस सरकार के बबन-पालन की ओर देोवेगे, और उसके बाद जनता सरकार के बवन-पाठन की ओर. इसमें जितने भी आक्डों का उपयोग किया गया है, वे सभी सरकार के बयानों में से हैं, या सरकार का समर्थन करने वाले प्रकाशनों में से यानी, बडे अखबारों से, जिनके मालिक बडे पूंजीपति है.

“योजना कमीशन, जो एक केन्द्रीय सरकार का संगठन है, का कहना है कि भारतीय जनता में से १० करोड लोगों का पर कैपिटा, या व्यक्तिगत मासिक वेतन सिर्फ रु० २५ है और दूसरे १४ करोड लोगों का व्यक्तिगत मासिक वेतन रु० २५ आर ८०५० के बीच है. यह आंकडे एक रिपोर्ट में दिये गये है, जो दि इकोनामिक टाइम्स (अम्रल १, १९७८) में प्रकाशित हुये थे, जिसका मालिक डालमिया जैन उद्योग-समूह है.

इन आंकडों का अर्थ क्या है? यह हमें दिखाते हैं कि ६० करोड की कुल आबाद वें से ४४ करोड (१० करोड २४ करोड) लोगों का वेतन रु० ५० से ज्यादा नहीं है.

अब हम थोडा सा सोबै तो हमें पता बलता है कि बचे हुए २० प्रतिशत में से भी बेहुसंख्य लोग अनीर नही है. वास्तव में, इस २३० प्रतिशत में से एक बडा हिस्सा शिक्षा टाइपिस्ट, होटल के तेटर, औद्योगिक मजदूर आदि का है. यह हिस्सा जीने के खर्व की व्यती हुई सोपा हारे गरीबी के विनदध हर दिन उडता रहता है, दूसरी और मि ७० प्रतिशत को हर दिन रस० १.६६ को से ज्यादा हाथ नहीं लगता नही नीम-परिस्थिति प‌तों से भी गई बीती है. इस तरह भारत में अमीरों की एक अत्यंत छोटी अल्पसंख्या है. फिर भी, यह अत्यंत छोटी अध्यांग्या अपनी निल्त के कारण, इस देश पर अपना रार पठा साती है, चूंकि उत्पादन के साधन (फोवियां, जमीन आदि) की मालिकी उनके हाथों में है, इसलिये इस अक्ष‌य गरीवी से कवने का सिर्फ एक ही उपाय हो सकता है अनारों को इन छोटी अल्पसंख्या, के हाथों से, पूंजीवादी और मींदारों से, उत्पादन के साथ छीन लिये बाने नाहिये, जो सरकार सह करने से इन्कार करती है, उसे सराजबादी नहीं कड़ा जा सस्ता, यद्यपि वह अपने आपको लारवादी कहती रहे. पेली सर सरकार पूंजीवादी मीदारी सरकार ही होती है. सिर्फ सदर वर्ग स्वयं के यहा और साकार द्वारा समाजवाद का निर्माण र स्वता है.

अब इस कुछ और नाक्छों को देखें, अपके ११, १९७७ के इकोनामिक टाइम्स के अनुसार, १९६०-६१ नै हरेक भारतीय को प्रति दिन १६८,७ जान जनाब (बाक्छ, गेहूँ आदि) और दाल निउ सन्ते थे. उही सय ने बीब, यानी १९६१-६२ में, उसे हर साठ ११.८६ नीटर सूती कपडा भी मिल सकता था. लेकिन, नव काग्रेस सरकार और इन्दिरा गांधी का गरीबी हटाना सहन हुआ, यानी १९७६-७७ में, हरेक नारतीय को प्रति दिन सिर्फ ४३८.७ ग्राम अनाब और दासनिक सरते थे, और हर साल सिर्फ ११.४ नीटर सूती कपडा पिठ सकता था. दूसरे शब्दों हैं, अनान और दाल की प्राप्यता में ६.४ प्रतिशत की कभी हुई, और सूती कपडे की प्राप्यता में १७.४ प्रतिशत की कली, लेकिन, कहानी यहां सनाप्त नहीं होती है.

इन दोनों बांक्टाँ ऐ सिर्फ यह कहा जा रहता है कि अनाज, दाल और सुती कपडे की प्राप्यता में कमी हुई हैं. इससे हमें पता नहीं करता है कि लोगों ने कितना जरीदा, या उपनोग किया (Consumed), हम जरूर समझा जापगे कि यह मात्रा बहुत ही कम होगी, जब रूम याद करते हैं कि हमारे छोगों में से ७० प्रतिशत की रोजी सिर्फ रु० १.६६ पेजे ही है. संक्षेप में, यही है काग्रेस सरकार के बक्न-पाठन का वित्र.

जनता पहा का अतन-पाउन देखा रहा है? योजना कमीशन के अनुसार देखिये झोना फिल टाइम्स नई १, १९७८) १९५७ में, न पतता पहा सता में आया, रजिस्टर किये गये होर जिगारों की संख्या १९१९ ठाप्त थी. एक ही साल में, यानी, अप्रैल, १९७८ में यह संख्या बढ़कर १९७२ टाप्त हो गई. दूसरे शब्दों में, सिर्फ एम्प्लायमेंट पक्सर्वेज में रजिस्टर किये हुन बेरोगारों की संख्या ४.८ प्रतिशत ब्ड गयी है. योक्ता क्वीशन द्वारा प्रकाशित कुछ और आंकडे हमें पर कैपिटा बेतन के बारे में जानकारी देते हैं. एक देश के पर कैपिटा वेतन का मतलब होता है, देश के कुठ वेतन का देश की कुल आबादी द्वारा विभाजन करना, दूसरे शब्दों में, पर कैपिटा वेतन हुने यह बताता है कि अगर देश को कुछ वेतन को कुल आबादी में बराबर बराबर बांट दिया जाए, तो एक व्यक्ति को कित्ता पिठ सकता है. हमें यह पता नहीं चलता है कि एक व्यक्ति को वास्तव ने कितना मिल रहा है. फिर भी, यह एक रन नियम बात है कि पर कैपिटा वेतन यानी, वह वेतन जो एक व्यक्ति को निठ साता है, अप्रैल १९७७ में रू०६९९०३ से अप्रैळे, १९७८ में र८० ६११.२ तक गिरा. यह जरून जनता पक्ष को सता में आने के बाद के लोकतंत्र की ही कृपा है.

कता पट्टा के चुनाव के पहले के वक्नों में से एक महत्वपूर्ण वक्न यह था कि एकाधिकारी गृहाँ (Monopoly houses ) के विस्तार पर अंकुश लगाया जाएगा चुनाव के बाद, उन्होंने वास्तव में क्या किया है ?

कंपनी अफेर्स के विभाग द्वारा प्रकाशित जुलाई-दिसंबर १९७७ के रिव्यू के अनुसार केन्द्रीय सरकार को इस काल के दौरान २३ अर्जियां पेश की गई थीं. अर्जियों में से, इछ ऐसे गृहाँ के विस्तार के लिये थीं जो आज अस्तित्व में है, और कुछ नए कारखाने शुरू करने के लिये इन २८ अर्जियों में से २३ को ठायसेंस दिये गये, और “फाधिकार कमीशन को इसके बारे में पूछा तक नहीं गया, हाठा कि पास की गयी २३ अर्जियों में से १२ अर्जिया बिडठा, टाटा, सिंघानिया, आदि जैसे एकाधिकारी गृहाँ से आई थीं, इन २३ कंपनियों की कुल पूँजी रू० १७०.४६ करोड है. इसमें से :

बिडला को रु० ७२.०८ करोड पूंजी लगाने दिया गया है. सिंघानिया (जे. के. ज्गुट) को रन० २७.७० करोड की पूंजी लगाने दिया गया है. थापार को रु० १८.४५ करोड की पूंजी उगाने दिया गया है. टाटा को रु० ९.०२ करोड की पूंजी लगाने दिया गया है. श्रीराम गुट को रन० ४.१५ करोड की पूंजी लगाने दिया गया है.

इन पांव विशाल एकाधिकारी गृहों को, सब मिलाकर, रु० १३१.८१ करोड की कुठ पूंजी ठणाने दिया गया है, यानी रु० १७०,४६ कर रोड की कुल पूंजी से ७७ प्रतिशत पूंजी पांव एका धिकारी गृहों के हाथ में है.

लेकिन यह र८० १७०.४६ करोड आएगा कहा से ? कंपनी अफेयर्स विभाग के रिव्यू के अनुसार २३ कंपनियों के प्रस्ताबों के लिये, जित का एक बड़ा हिस्सा वित देने बाठी संस्थाओं, और राष्ट्रीयकरण की गयी बैंकों द्वारा दिया जाएगा. दूसरे शब्दों में, यह एकाधिकारी गृह जनता के पैसे का पूंजीकरण करके, अपने लिये सुनाफा कराने वाले हैं।

पिल्ले कुछ साठी वें, काधिकारी गृहों ने कितना गुनाफा कमाया है? ऐसे एक प्रश्न का उत्तर देते हुए, केन्द्रीय कानून और कम्पनी अफेयर्स मंत्री, गांतीष्ठाण ने पई ८, १९७७ के दिन ठोकसभा में कहा था कि सबसे बडे ४५ एकाधिकारी गहाँ की रालिकी के ११७ कारखानों ने १९७२ और १९७५ के बीच अपने टैक्स-पूर्व पुनाफे में ६० प्रतिशत से ज्यादा बढोतरी की है. (देखिये, इकोनामिक टाइम्स, पई १०, १९७७) शांती भूषण वह विख्यात वकीठ है, जिसने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इन्दिरा गांधी के विरुद्ध राज्मारावण का सुक्दना जीता था. हरेक अच्छे वकील की तरह, शांतीभूषण अपने शब्द कुनने में बहुत सावधान है. इसलिए, वह ६० प्रतिशत से ज्यादा बढाती के बारे में बात करता है जो सबसे बडे ४५ एकाधिकारी गृहाँ की मालिकी के ११७ कारखानों के टैक्स-पूर्व चुनाफे में हुई है. यह बालाक कील यहां एक साधारण गणित की बाल बलता है.

मसलन्, अगर पूंजीपति अ १० प्रतिशत पुनाफा कनाती हुई ३ पिठों का मालिक है, और पूंजीपति व १ प्रतिशत जुनाफा कमाती हुई ४ मिलों का मालिक है, तो शांती भूषण कहेगा : दो पूंजीपतियों की नालिकी की ७ निठों को प्रतिशत से ज्यादा उनाका हुआ, जब कि इप कहेंगे कि पूंजीपति अ और वे की सभी मिलों को साथ गिनते हुए, २० पतिशत और २० प्रतिशत सुनाफा हुआ. जरा फर्क देखिये.

हर्ने याद रखना बाहिए कि चुनाफा मिठों को नहीं निठता है, बल्कि उस पूंजीपति को जो निल का ना ठिक है. इसलिये, सही रास्ता यह होगा कि एकाधिकारी गृहाँ के आफे को देखा जाए, न कि हर एक निठ के.

ट्भाग्य से, “इकोनाकि टाइम्स (नई १०, १९७८) ने सिर्फ ४५ एकाधिकारी गृहाँ में से २० की नाटिकी के ११२ कारखानों के बारे में जानकारी प्रकाशित की है. परन्तु, यह होते हुए भी, जब हन इन ११३ कारखानों का विभाजन एका धिकारी गृहाँ की नालिकी के आधार पर करते है, तब हनें दिखाई देता है कि आफे का प्रतिशत दर बहुत ही ऊंचा है. निलों के चुनाफे नै ५० प्रतिशत से ज्यादा बढाती की जगह, २० एकाधिकारी गृहाँ

मैं १९७४ और १९७५ के बीब के तीन सालों में, १०० प्रतिशत से ज्यादा चुनाफा कराया है

एकाधिकार गृह — १९७७ और १९७८ के बीच लाभ प्रतिशत बढ़ोतरी

  1. ए. सी. सी. — 125.1 प्रतिशत
  2. अशोक लेलैंड — 403.72 प्रतिशत
  3. बिड़ला — 222.66 प्रतिशत
  4. बर्ड हेइल्जर्स — 430.24 प्रतिशत
  5. बॉम्बे स्टीमशिप — 1926.39 प्रतिशत
  6. डनलप — 233.81 प्रतिशत
  7. एस्कॉर्ट्स — 248.82 प्रतिशत
  8. जेंस पिन्टले — 226.36 प्रतिशत
  9. करटुभाई हलवाई — 196.92 प्रतिशत
  10. खटाऊ (बम्बई) — 222.02 प्रतिशत
  11. जे. के. सिंघानिया — 223.39 प्रतिशत
  12. किर्लोस्कर — 307.69 प्रतिशत
  13. मैकनील एंड मैगॉर — 263.99 प्रतिशत
  14. रिलायंस — 100.78 प्रतिशत
  15. रि. गिन्द्या — 223.99 प्रतिशत
  16. सिम्पसन — 257.02 प्रतिशत
  17. टी. वी. एस. अयंगार — 202.16 प्रतिशत
  18. थापर — 148.30 प्रतिशत
  19. वी. एस. डेम्पो — 2808.82 प्रतिशत
  20. वालचंद — 244.63 प्रतिशत

“जब पूंजीपति इतना मुनाफ़ा कमा रहे थे, तब मज़दूरों की परिस्थिति क्या थी?

इस प्रश्न का उत्तर देने, हमें ऊपर दिये हुए खेल के बीसों एकाधिकार गृहों की हर मिल का बैलेंस-शीट देखना पड़ेगा। दुर्भाग्य से, हम सिर्फ दो मिलों का बैलेंस-शीट प्राप्त कर सके हैं, एक ए.सी.सी. लिमिटेड का जिसका मालिक टाटा हैं, और दूसरा ओरियंट पेपर मिल्स, लिमिटेड का, जो बिड़ला की कम्पनी हैं।” भारत के दो सबसे बडे एकाधिकारी गृहों की, इन कम्पनियों के बैठेन्समीट का अध्ययन करते हुए हमें पता कता है कि प. सी. सी. १९७२-७७ के बीब कर्नवारियों के वेतन नं ७५.९८ प्रतिशत व्होती हुई. दूसरी और, नाफे में १३३.७२ प्रतिशत की व्छाती हुई. ओरियंट पेपर निल्स में, वेतन में ८०.६८ प्रतिशत की व्हाती हुई, जब कि आफै नै ११४,१६ प्रतिशत की बढाती हुई.

संहाँप में, यह उसी नीति का एक रूप है, जिसे कागेस पिछले तीस साठों से अपने देश में लागू कर रही थी, और जिसे लागू करने में आज साता पक्ष मी ठगा है. यह नीति तब तक लागू रहेगी, जब तक अस्ति वर्ग अपनी राजनैतिक चेतना को जागृत नहीं करता है, और स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सपाजवाद की प्राप्ति के लिये अपना राजनैतिक संघर्ष शुरू नहीं करता है.

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